बिलासपुर। जूनियर वकीलों को हर महीने आर्थिक सहायता देने की मांग को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है। इस मामले में अदालत ने विधि विभाग के प्रमुख सचिव से विस्तार से हलफनामा पेश करने को कहा है। कोर्ट जानना चाहता है कि इस दिशा में सरकार अब तक क्या कदम उठा चुकी है और आगे क्या योजना है। मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।
मदद करनी है तो ठोस नियम बनाएं
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अगर जूनियर वकीलों को मदद देनी है, तो इसके लिए ठोस नियम बनाए जाने चाहिए। केवल आश्वासन से काम नहीं चलेगा। याचिका दायर करने वालों में सना मेमन और अन्य युवा अधिवक्ता शामिल हैं। उनका कहना है कि वकालत के शुरुआती दिनों में आमदनी बहुत कम होती है, जबकि खर्चे लगातार बने रहते हैं।
कई राज्यों में है स्टाइपेंड योजना
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि झारखंड, पुडुचेरी, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे राज्यों में जूनियर वकीलों के लिए मासिक स्टाइपेंड की व्यवस्था पहले से लागू है। झारखंड स्टेट बार काउंसिल ने 2016 में नए अधिवक्ताओं के लिए स्टाइपेंड नियम बनाए। पुडुचेरी सरकार ने 2020 में जूनियर अधिवक्ताओं को मानदेय देने की योजना लागू की। आंध्र प्रदेश में जूनियर वकीलों को हर महीने 5,000 रुपये तक की सहायता दी जाती है। ऐसे में छत्तीसगढ़ में भी इसी तरह की व्यवस्था लागू करने की मांग उठी है। याचिका में बताया गया कि राज्य बार काउंसिल में पंजीयन के लिए करीब 16,000 रुपये शुल्क देना पड़ता है। इसके बाद दफ्तर, किताबें और रोजमर्रा के खर्च अलग से होते हैं।
मासिक मानदेय से युवा वकीलों को मिलेगा सहारा
आर्थिक तंगी के कारण कई प्रतिभाशाली कानून स्नातक वकालत का पेशा छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अगर सरकार मासिक मानदेय की व्यवस्था करे, तो युवाओं को सहारा मिलेगा और न्याय व्यवस्था को भी मजबूत आधार मिलेगा। अब सबकी नजर 19 मार्च की सुनवाई पर है। उस दिन विधि विभाग के प्रमुख सचिव द्वारा दाखिल हलफनामे के आधार पर आगे की दिशा तय होगी।

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