भाटापारा। भारत के तीर्थ सनातन धर्म, संस्कृति के केन्द्र बिन्दु हैं। तीर्थों का आध्यत्मिक महत्व भी है जिनका पवित्र स्वरूप मावन मन में शुद्ध भाव जागृत कराते हैं। तीर्थ यात्रा में स्नान, ध्यान, दर्शन और विचरण से पापों का प्रायश्चित होने के साथ साथ आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है हमारा अन्तःकरण शुद्ध होता है। श्रीनारायणी नवलधाम में श्रीमद्भागवत कथा प्रवचन करते हुए आचार्य श्री झम्मन प्रसाद शास्त्री ने देश के तीर्थ स्थलों, मंदिरों के महात्म्य को बताते हुए कहा कि हमारी पीढ़ी को ऐसा प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि वे सनातन धर्म संस्कृति से परिचित हो सके। आचार्य श्री ने कहा कि सनातन धर्म, संस्कृति में हमारे मंदिर भक्ति, संस्कार और सामुदायिकता एकता के आधारभूत स्थल हैं। मानव मन में ईश्वर के प्रति श्रदा, भक्ति के साथ व्यवहारिक जगत के नैतिक मूल्यों को जागृत करते हैं। मंदिर पूजा स्थल के साथ आध्यत्मिक ऊर्जा के स्त्रोत हैं। जीवन के चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम मोक्ष की प्राप्ति होती है। विश्वास दृढ़ होता है और हमारे नकारात्मक भाव दूर होते हैं। मंदिर सनातन संस्कृति की रक्षा के साथ सामाजिक सौहार्द बढ़ाते हैं, ऊर्जा केन्द्र हैं, जहाँ शंख, घंटी की ध्वनि और धूप-दीप से मन को शांति मिलती है। भक्ति, ज्ञान और सेवा भाव को बढ़ाने वाले हैं। जो शुद्धता, श्रद्धा भाव लाते हैं। मंदिर सनातन धर्म के साथ वैज्ञानिक सिध्दांतों को समाहित किए हुए हैं। मंदिरों की वास्तुकला, ऊर्जा प्रवाह विज्ञान सम्मत है। मंदिरों में देव दर्शन और परिक्रमा से सकारात्मक ऊर्जा हमारे शरीर में आत्मसात होती है। घंटी ध्वनि, शंखनाद से बैक्टीरिया नष्ट होते हैं। मंत्रोच्चार से मस्तिष्क तनाव रहित होता है। दर्शन से मानसिक शांति मिलती है। नंगे पैर चलने से शरीर में धनात्मक ऊर्जा हमारे भीतर प्रवाहित होती है। वातावरण शुद्ध ऊर्जा से परिपूर्ण हो जाता है। मंदिर सनातन धर्म संस्कृति के केन्द्र हैं। मंदिरों से यह ज्ञान व प्रशिक्षण देना चाहिए ताकि सनातन, घर्म, संस्कृति और उसके विज्ञान को आने वाली पीढ़ी जाने और व्यवहारिक जगत जगत में उसका लाभ ले सकें। मंदिर में सत्संग में तीर्थ, पर्व के महात्म्य और उसकी वैज्ञानिकता की भलि भांति जानकारी दी जानी चाहिए। ताकि हम संस्कारित होकर सनातन धर्म, संस्कृति की रक्षा कर सकें।

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