रायपुर:छत्तीसगढ़ में नक्सल सरेंडर नीति को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। कांग्रेस के संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने सरकार के फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरेंडर पॉलिसी के नाम पर उन नक्सलियों के केस भी वापस लिए जा रहे हैं, जो झीरम घाटी और तारमेटला जैसी भीषण घटनाओं में शामिल रहे। शुक्ला ने कहा कि ऐसे फैसले पीड़ित परिवारों के घावों को फिर से ताज़ा करने वाले हैं।
इसके साथ ही उन्होंने यह भी पूछा कि बड़ी संख्या में वे आदिवासी, जिन्हें किसी घटना में शामिल न होने के बावजूद नक्सली बताकर जेलों में डाल दिया गया है—उनके मामले में सरकार क्या कदम उठा रही है?
कांग्रेस ने इसे न्याय और संवेदनशीलता से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया है।
कांग्रेस के संचार प्रमुख, सुशील आनंद शुक्ला ने एक महत्वपूर्ण संवाद में कहा कि यह जो फैसला लिया गया है, वह न केवल अत्यंत अलोकतांत्रिक है, बल्कि यह उन पीड़ितों के लिए भी अत्यधिक दुखदायी है, जिनका भला होना चाहिए था। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार ने एक समर्पण नीति बनाई है, जिसके अंतर्गत नक्सलियों को आत्म-समर्पण करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है, यह एक सकारात्मक पहल हो सकती है। हालांकि, उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्या इस नीति का दायरा उन नक्सलियों तक भी विस्तारित किया जाएगा, जो झीरम के हमले और तारमेटला हमले जैसे गंभीर अपराधों में शामिल थे।
सुशील आनंद शुक्ला ने संकेत किया कि ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ पेंडिंग आपराधिक प्रकरणों को समाप्त करने का निर्णय उनकी दंडनीयता को कम करेगा। इसके अलावा, उन्होंने यह भी पूछा कि नक्सलियों के खिलाफ दर्ज सभी आपराधिक मामलों को वापस लेने का निर्णय लेना है, लेकिन क्या इस प्रक्रिया के दौरान उन आदिवासियों के बारे में भी कुछ विचार किया जाएगा, जो निर्दोष हैं और जिन्हें झूठे आरोपों के आधार पर जेलों में रखा गया है।
उन्होंने यह स्पष्ट किया कि बड़ी संख्या में आदिवासी, जो किसी भी अपराध में शामिल नहीं थे, उन्हें पुलिस द्वारा केवल अपने मिशन को पूरा करने के लिए नक्सली बताकर सलाखों के पीछे डाल दिया गया है। ये लोग लगातार पेशी दर पेशी का सामना कर रहे हैं और उनके भविष्य का क्या होगा, इस पर भी कोई निर्णय नहीं लिया जा रहा है। उनके सवाल के माध्यम से उन्होंने यह आग्रह किया कि आदिवासियों की ज़िंदगी और गरिमा की सुरक्षा पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

