बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में डिस्टलरी से जल प्रदूषण के मामले में छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल CECB की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना, भाटिया वाइन मर्चेंट्स प्राइवेट लिमिटेड की डिस्टलरी से भूमिगत पाइप के जरिए गंदा पानी आसपास के खेतों में छोड़ा जा रहा था, जबकि पूर्व में पर्यावरणा संरक्षण मंडल की रिपोर्टों में कंपनी के खिलाफ प्रदूषण का कोई मामला सामने नहीं आने की बात कही गई थी। कोर्ट ने कहा कि CECB और कंपनी के बीच मिलीभगत की संभावना से इस स्तर पर इंकार नहीं किया जा सकता। जनहित याचिका की अगली सुनवाई के लिए कोर्ट ने 16 सितंबर 2026 की तिथि तय कर दी है।
कोर्ट कमिश्नरों ने डिवीजन बेंच को सौंपी रिपोर्ट में बताया, भाटिया वाइन मर्चेंट्स और वेलकम डिस्टलरीज जल स्रोतों को प्रदूषित कर रही थीं, जबकि छत्तीसगढ़ डिस्टलरीज के मामले में भी निगरानी की आवश्यकता बताई गई।
भाटिया वाइन मर्चेंट्स के संबंध में 13 अगस्त को सीईसीबी की टीम ने निरीक्षण किया। इसमें पाया कि डिस्टलरी परिसर से भूमिगत पाइप के जरिए औद्योगिक अपशिष्ट और गंदा पानी बाहर निकालकर पास के कृषि खेत में छोड़ा जा रहा था। खेत में दूषित पानी जमा मिला और आसपास खजुरी नाला तथा अन्य कृषि भूमि भी मौजूद थी।
सीईसीबी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा कि प्रदूषण वाले स्थान के आसपास कोई दूसरी औद्योगिक इकाई नहीं थी और वहां से लिए गए प्रदूषित पानी के नमूने व फोटो भी पेश किए गए।
प्रदूषण की पुष्टि के बाद सीईसीबी ने 17 अगस्त 2026 को जल अधिनियम की धारा 33-ए के तहत डिस्टलरी तत्काल बंद करने का आदेश दिया। बिजली कनेक्शन काटने, भूमिगत पाइप हटाने और भविष्य में परिसर से किसी भी तरह का औद्योगिक अपशिष्ट बाहर नहीं छोड़ने के निर्देश दिए गए। इसके अलावा कंपनी को हर समय जीरो लिक्विड डिस्चार्ज व्यवस्था बनाए रखने को कहा गया। प्रदूषण की अवधि के लिए पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति भी लगाए जाने की बात कही गई है।
हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड पर गौर करते हुए पाया कि जुलाई 2026 में सीईसीबी की जांच में भाटिया वाइन मर्चेंट्स की इकाई को अधिकांश शर्तों का पालन करते हुए बताया गया था। यहां तक कि उस समय जीरो लिक्विड डिस्चार्ज की स्थिति और उपचारित पानी के पुन: उपयोग की बात रिपोर्ट में दर्ज थी। लेकिन 13 अगस्त की जांच में भूमिगत पाइप से खेतों में अपशिष्ट जल छोड़े जाने का मामला सामने आया। कोर्ट ने इन दोनों स्थितियों को गंभीरता से लेते हुए कहा कि कोर्ट कमिश्नरों की रिपोर्ट और बाद में मौके पर सामने आए तथ्यों से प्रथम दृष्टया लगता है कि वास्तविक तथ्य कोर्ट के सामने नहीं रखे गए।
डिवीजन बेंच ने कहा, इस मामले में सीईसीबी की भूमिका भी जांच के योग्य है, विशेष रूप से भाटिया वाइन मर्चेंट्स के संबंध में उसके आचरण और कोर्ट के समक्ष तथ्यों को पेश करने के तरीके की जांच आवश्यक है।
कोर्ट ने कहा, इससे पहले 4 जुलाई 2025 के उल्लंघन पर सीईसीबी ने कंपनी पर 1.20 लाख रुपये पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाई थी, जिसे कंपनी ने जमा कर दिया था। बाद की निगरानी रिपोर्टों में बार-बार प्रदूषण नहीं होने की बात सामने आई, लेकिन अब भूमिगत पाइप से खेतों में अपशिष्ट जल छोड़े जाने का तथ्य सामने आया है।
सीईसीबी की रिपोर्ट में वेलकम डिस्टलरीज का मामला भी सामने आया। इस इकाई पर पहले गंभीर उल्लंघनों के लिए 54.20 लाख रुपये पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाई गई थी और उद्योग बंद करने का निर्देश दिया गया था। कंपनी ने अब तक यह राशि जमा नहीं की है। बाद में 4.60 लाख रुपये की अतिरिक्त क्षतिपूर्ति लगाई गई, जिसमें से यह राशि जमा किए जाने की जानकारी दी गई है।
फिलहाल वेलकम डिस्टलरीज बंद है और सीईसीबी बकाया पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की वसूली के लिए शिकायत प्रकरण शुरू करने की प्रक्रिया में है। हाई कोर्ट ने मामले को अब केवल डिस्टलरी प्रदूषण तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण मंडल की निगरानी और रिपोर्टिंग की भूमिका को भी जांच के दायरे में ले लिया है।

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