जंगलों में जारी है दुर्लभ जीवों का कत्लेआम, विलुप्तप्राय पैंगोलिन के शल्क के साथ 6 तस्कर गिरफ्तार, दुनिया में सबसे ज्यादा तस्करी होने वाले जीव के बारे में जानिए

जंगलों में जारी है दुर्लभ जीवों का कत्लेआम, विलुप्तप्राय पैंगोलिन के शल्क के साथ 6 तस्कर गिरफ्तार, दुनिया में सबसे ज्यादा तस्करी होने वाले जीव के बारे में जानिए

बचेली / दंतेवाड़ा। छत्तीसगढ़ के जंगलों में वन्यजीवों का शिकार और तस्करी थमने का नाम नहीं ले रही है। हाथी, तेंदुआ के साथ ही विलुप्तप्राय श्रेणी में शामिल दुनिया के सबसे दुर्लभ जीव पैंगोलिन के शिकार के मामले भी लगातार सामने आ रहे हैं। बस्तर के बचेली वन विभाग ने गीदम में नाकेबंदी कर 14 किलो पैंगोलिन शल्क के साथ 6 तस्करों को गिरफ्तार किया है।
बचेली रेंजर डॉ. प्रीतेश पांडे को मुखबिर से सूचना मिली थी कि एक ईको वैन से पैंगोलिन शल्क की बड़ी खेप जगदलपुर की ओर ले जाई जा रही है। संदिग्ध वाहन गीदम थाना क्षेत्र में होने की जानकारी पर DFO वाय. रंगनाथा रामकृष्णा के निर्देश पर गीदम SDO शिवेन्द्र सिंह और रेंजर शिव टंडन की संयुक्त टीम ने गीदम थाना के सामने नाकेबंदी की।
तस्करों ने बड़े ही शातिराना तरीके से पेंगोलिन के शल्क छिपा रखे थे। वाहन की तलाशी के दौरान प्रारम्भ में कुछ नजर नहीं और मगर सूक्ष्म तरीके से तलाशी में ईको वैन के इंजन बोनट और स्टेपनी के भीतर गुप्त तरीके से छिपाकर रखा गया 14 किलो शल्क बरामद हुआ।
वैन में पकड़े गए तीन आरोपियों से पूछताछ के बाद टीम ने जावंगा एजुकेशन सिटी के पास दबिश दी। वहां बाइक से शल्क लेकर खड़े तीन अन्य तस्करों को भी धर दबोचा गया। मौके से तस्करी में इस्तेमाल हो रही एक मारुति ईको वैन और दो बाइक भी जब्त की गई हैं।
वन विभाग के मुताबिक सभी 6 आरोपी बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा जिले के निवासी हैं, जो लंबे समय से बस्तर के जंगलों में सक्रिय हैं। आरोपियों के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत कार्रवाई की जा रही है।
कुछ समय पूर्व ही उप वनमण्डलाधिकारी बस्तर, परिक्षेत्र अधिकारी करपावण्ड सौरभ रजक एवं अन्य वन अधिकारियों की एक टीम गठित कर करपावण्ड कोलावल मार्ग पर घेराबंदी कर 02 नग मोटर सायकल में एक जूट की थैले में 01 नग संकटपन्न जीवित वन्य जीव पेंगोलिन (छत्तीसगढ़ी में साल खपरी कहा जाता है) के साथ चार आरोपियों को पकड़ा गया था। यह चारों व्यक्ति वन्य जीव को बेचने के फिराक में ग्राहक तलाश कर रहे थे।
वन विभाग के अधिकारियों द्वारा उक्त वन्य प्राणी को सुरक्षित अपने कब्जे में लेकर चारों आरोपियों को करपावण्ड वन परिक्षेत्र कार्यालय लाया गया एवं भारतीय वन अधिनियम 1927 तथा वन्यप्राणि संरक्षण अधिनियम 1972 के विभिन्न धाराओ के तहत् वन अपराध दर्ज कर अग्रिम वैधानिक कार्यवाही की गई।
पैंगोलिन एक ऐसा जीव है जो विलुप्त प्रजाति की कगार पर है और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-1 में शामिल है। इसके शल्क की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत लाखों रुपये प्रति किलो तक आंकी जाती है। चीन और वियतनाम जैसे देशों में इसके शल्क से परंपरागत दवाइयां और नशे की सामग्री बनाई जाती है, जिसके चलते इसकी अंधाधुंध तस्करी हो रही है। एक पैंगोलिन से मात्र 1.5 से 2 किलो शल्क ही मिलता है, यानी 14 किलो शल्क के लिए 6 से 7 पैंगोलिन को बेरहमी से मारना पड़ा होगा।
पैंगोलिन का नाम मलेय भाषा के शब्द “पेंगगुलुंग” से आया है, जिसका अर्थ है “रोलर”। खतरे में ये अपने नरम पेट को बचाने के लिए खुद को गोल में लपेट लेते हैं। इनके पैमाने उन्हें शिकारियों से बचाने के लिए कवच का काम करते हैं।
एक पैंगोलिन साल में लगभग सात करोड़ कीड़े खा सकता है। इससे न केवल फसलों की सुरक्षा होती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को फायदा होता है।
वर्तमान में छत्तीसगढ़ सहित देश भर के जंगलों से इसका अत्यधिक शिकार हो रहा है जिसमें रोग-निवारण के लिए इसके अंगों को खाने की झूठी और अन्धविश्वासी प्रथाएँ भी भूमिका देती हैं। इस कारणवश यह विलुप्ति की कागार पर आ गया है।
बस्तर में नक्सलियों का राज ख़त्म होने के बाद लगातार पैंगोलिन, तेंदुआ और भालू जैसे दुर्लभ वन्यजीवों का शिकार हो रहा है, लेकिन वन अमला सिर्फ सूचना मिलने पर कार्रवाई तक सीमित है। जंगलों में गश्त, मुखबिर तंत्र और तस्करों के नेटवर्क को तोड़ने में विभाग पूरी तरह लापरवाह बना हुआ है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय तस्कर गिरोह बेखौफ होकर आदिवासियों को पैसा देकर शिकार करा रहे हैं और बस्तर को तस्करी का कॉरिडोर बना दिया है।

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