अदालत की तरह न्यायिक आदेश जारी नहीं कर सकता महिला आयोग : हाईकोर्ट

अदालत की तरह न्यायिक आदेश जारी नहीं कर सकता महिला आयोग : हाईकोर्ट

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राज्य महिला आयोग की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिला आयोग की भूमिका सिफारिश और सुझाव देने तक सीमित है, वह अदालत की तरह किसी पक्ष के अधिकार, दायित्व या जवाबदेही तय करने वाला बाध्यकारी आदेश जारी नहीं कर सकता।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (GAIL) की रिट याचिका स्वीकार करते हुए राज्य महिला आयोग द्वारा जारी 19 जून 2025, 6 जुलाई 2026 और 8 जुलाई 2026 के तीन विवादित आदेशों को अधिकार क्षेत्र से बाहर माना और उन्हें रद्द कर दिया।
मामला गैस पाइपलाइन बिछाने से जुड़ा था। GAIL की ओर से अधिवक्ता संदीप दुबे ने कोर्ट में दलील दी कि भूमि में उपयोग के अधिकार का अधिग्रहण संबंधित अधिनियम के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए किया जा रहा था। सक्षम प्राधिकारी द्वारा संबंधित भूमि के मुआवजे की राशि भी निर्धारित की जा चुकी थी।
इसके बावजूद महिला आयोग ने कथित तौर पर अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर मुआवजे की राशि बढ़ाने और क्षतिपूर्ति देने का आदेश जारी किया। इसके साथ ही GAIL के अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज कराने की चेतावनी देते हुए पाइपलाइन निर्माण पर रोक लगाने का निर्देश भी दिया गया था।
GAIL की ओर से तर्क दिया गया कि महिला आयोग के पास इस तरह के बाध्यकारी और न्यायिक प्रकृति के आदेश जारी करने की वैधानिक शक्ति नहीं है।
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के भवानी प्रसाद जेना बनाम ओडिशा राज्य महिला आयोग सहित हालिया मुंबई पोर्ट अथॉरिटी मामले में दिए गए फैसलों का भी संदर्भ लिया।
हाई कोर्ट ने कहा कि महिला आयोग को दस्तावेज तलब करने और गवाही लेने जैसी शक्तियां तथ्यों की जांच-पड़ताल के लिए दी गई हैं। इन शक्तियों का मतलब यह नहीं है कि आयोग स्वयं न्यायालय की भूमिका ग्रहण कर किसी विवाद का अंतिम और बाध्यकारी फैसला सुनाने लगे।
कोर्ट के अनुसार, आयोग महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए सिफारिशी कदम उठा सकता है, लेकिन किसी विवाद का न्यायिक निपटारा करना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
हाई कोर्ट ने पाया कि इस मामले में राज्य महिला आयोग ने अपनी वैधानिक सीमा से आगे बढ़कर उन सक्षम प्राधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप किया, जिन्हें कानून के तहत संबंधित मामलों में निर्णय लेने का अधिकार है।
अदालत ने आयोग के तीनों विवादित आदेशों को कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं माना। कोर्ट ने इन आदेशों को रद्द करते हुए GAIL की याचिका स्वीकार कर ली।
इस फैसले के बाद महिला आयोग की शक्तियों को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो गई है कि आयोग जांच और सिफारिश कर सकता है, लेकिन अदालत की तरह बाध्यकारी न्यायिक आदेश जारी नहीं कर सकता।

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