बिलासपुर। भ्रष्टाचार के एक अहम मामले में बिलासपुर हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल रिश्वत की रकम बरामद हो जाने से किसी आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषसिद्धि के लिए रिश्वत मांगने का आरोप भी अभियोजन पक्ष को संदेह से परे साबित करना होगा।
हाई कोर्ट ने रिश्वत मामले में दोषी ठहराए गए दो सरकारी कर्मचारियों की सजा को निरस्त करते हुए उन्हें बरी कर दिया। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांगने के आरोप को कानूनी मानकों के अनुरूप साबित करने में असफल रहा।
मामले की सुनवाई हाई कोर्ट की सिंगल बेंच में हुई। अभियोजन पक्ष ने रिश्वत मांगने से जुड़ी बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग को साक्ष्य के रूप में पेश किया था, लेकिन कोर्ट ने पाया कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं की गई थी।
कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के लिए प्रमाण-पत्र जरूरी है। इसके अलावा रिकॉर्डिंग में मौजूद आवाज की पुष्टि के लिए वॉइस सैंपल और फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट जैसे तकनीकी साक्ष्यों की भी आवश्यकता होती है। इस मामले में जांच एजेंसी न तो शिकायतकर्ता और आरोपियों के वॉइस सैंपल ले सकी और न ही रिकॉर्डिंग का वैज्ञानिक परीक्षण कराया गया।
अभियोजन का आरोप था कि शिकायतकर्ता की पत्नी की छह महीने से रुकी हुई सैलरी जारी करने के बदले आरोपियों ने 5 हजार रुपये रिश्वत मांगी थी। एसीबी की कार्रवाई में 12 अक्टूबर 2010 को ट्रैप के दौरान एक आरोपी के पास से रिश्वत के नोट बरामद किए गए थे।
हालांकि कोर्ट ने पाया कि ऑडियो रिकॉर्डिंग में कई लोगों की आवाजें थीं और उसकी स्पष्ट पहचान नहीं हो सकी। रिकॉर्डिंग की आवाज की पुष्टि केवल शिकायतकर्ता के बयान के आधार पर की गई थी। इसके अलावा रिकॉर्डर जब्त होने से पहले कई दिनों तक शिकायतकर्ता के पास रहा, जिससे छेड़छाड़ की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रिश्वत की मांग साबित होना भ्रष्टाचार के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। केवल रकम बरामद होना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों को अपर्याप्त मानते हुए दोनों कर्मचारियों को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।

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