बिलासपुर में हर हफ्ते हत्या, जशपुर सबसे हिंसक जिला; विधानसभा में चौंकाने वाले आंकड़े

बिलासपुर में हर हफ्ते हत्या, जशपुर सबसे हिंसक जिला; विधानसभा में चौंकाने वाले आंकड़े

रायपुर । छत्तीसगढ़ विधानसभा के मानसून सत्र में कानून-व्यवस्था को लेकर पेश किए गए आंकड़ों ने राज्य में बदलते अपराध के स्वरूप की तस्वीर सामने रख दी है। उप मुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री विजय शर्मा द्वारा साझा किए गए जिलेवार अपराध आंकड़ों के अनुसार, अब अपराध केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि शांत और आदिवासी क्षेत्रों में भी हिंसक घटनाओं में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। रिपोर्ट से साफ संकेत मिलता है कि राज्य में अपराध का भूगोल तेजी से बदल रहा है और पुलिसिंग के पारंपरिक तरीके नई चुनौतियों के सामने कमजोर पड़ रहे हैं।
न्यायधानी बिलासपुर अपराध के मामलों में राज्य के सबसे संवेदनशील जिलों में शामिल हो गया है। बीते दो वर्षों में जिले में 109 हत्या के मामले दर्ज हुए, यानी औसतन हर सप्ताह एक हत्या हुई। इसी अवधि में 65 लूट और राहजनी की घटनाएं भी सामने आईं। विशेषज्ञों का मानना है कि शहर का तेजी से विस्तार, बाहरी क्षेत्रों में कमजोर निगरानी और बढ़ते भूमि विवाद अपराध बढ़ने की बड़ी वजह हैं।
सबसे चौंकाने वाले आंकड़े जशपुर जिले से सामने आए हैं। शांत और जनजातीय क्षेत्र के रूप में पहचाने जाने वाले जशपुर में पिछले दो वर्षों में 114 हत्याएं दर्ज की गईं, जो पूरे प्रदेश में सबसे अधिक हैं। यह आंकड़ा दुर्ग और बिलासपुर जैसे बड़े शहरी जिलों से भी ज्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार पारिवारिक विवाद, आपसी रंजिश और सामाजिक कारणों से हिंसक घटनाओं में लगातार वृद्धि हुई है।
दुर्ग जिले में हत्या के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पिछले दो वर्षों में यहां 113 हत्या के मामले सामने आए। हालांकि राहत की बात यह रही कि पुलिस की कार्रवाई से लूट और डकैती के मामलों में करीब 37 प्रतिशत की कमी आई। लूट के मामले 43 से घटकर 27 रह गए।
बलौदाबाजार जिले में हत्या के 67 मामले दर्ज हुए, लेकिन सबसे अधिक चिंता हाईवे पर बढ़ती लूटपाट को लेकर जताई गई। यहां लूट के मामलों की संख्या 15 से बढ़कर 35 पहुंच गई। रिपोर्ट के मुताबिक औद्योगिक वाहनों की आवाजाही और सुनसान मार्गों का फायदा उठाकर गिरोह सक्रिय हैं।
विधानसभा में पेश रिपोर्ट के अनुसार बीते दो वर्षों में धमतरी, कोरबा, बलरामपुर और बीजापुर जिलों में पुलिस हिरासत के दौरान चार लोगों की मौत हुई। इन घटनाओं ने पुलिस व्यवस्था, मानवाधिकारों और हिरासत प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
रिपोर्ट का एक सकारात्मक पक्ष यह भी सामने आया कि नक्सल प्रभावित जिले कई शहरी क्षेत्रों की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित रहे। नारायणपुर जिले में दो वर्षों के दौरान हत्या और लूट समेत गंभीर अपराधों के कुल 43 मामले ही दर्ज हुए। इससे संकेत मिलता है कि जहां शहरों में संगठित अपराध और संपत्ति से जुड़े अपराध बढ़ रहे हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक और पारिवारिक विवाद हिंसा का प्रमुख कारण बन रहे हैं।
विधानसभा में पेश आंकड़ों से स्पष्ट है कि बदलते अपराध स्वरूप के बीच पारंपरिक पुलिस व्यवस्था पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। अपराध अब केवल शहरी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में भी कानून-व्यवस्था नई चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे में पुलिसिंग, खुफिया तंत्र और सामुदायिक निगरानी व्यवस्था को और प्रभावी बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

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